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बिना आंखों के ही 23 साल की उम्र में खड़ी कर दी 80 करोड़ की कंपनी(आईआईटी ने इस ब्लाइंड ब्वॉय को एडमिशन देने से कभी कर दिया था मना)

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जिंदगी में बहुत कम लोग होते हैं जो अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना पाते हैं। कई लोग तो सब कुछ होते हुए भी हार मान लेते हैं और अपनी किस्मत को दोष देने लगते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो अक्षमताओं का रोना नहीं रोते बल्कि वो कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसकी मिसाल पूरी दुनियां देती है। एक ऐसे ही शख्स है श्रीकांत बोला। श्रीकांत बोला की आंखे नहीं है वो देख नहीं सकते इसके बावजूद भी आज उन्होंने 80 करोड़ से अधिक की कंपनी स्थापित करके सफलता की नई कहानी (Success story) लिखी है। श्रीकांत बोला ने अपनी इस सफलता को कई मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करके अर्जित किया है। आइए जानते हैं उनके संघर्ष से सफलता तक का ये सफर।

श्रीकांत बोला का जन्म 1993 में हैदराबाद में हुआ था। उनका बचपन बड़ी ही गरीबी में बीता। श्रीकांत बोला के माता-पिता पढ़े-लिखे नहीं थे। उनके जन्म के समय उनके परिवार की कुल आय केवल 1600 रुपए ही थी। श्रीकांत जब पैदा हुए तो किसी को भी ज्यादा खुशी नहीं हुई थी क्योंकि वो नेत्रहीन थे। उनके पड़ोसियों और गांव वालों ने कहा कि यह किसी काम का नहीं है, इसे मार दो। उनके माता-पिता कई डॉक्टरों के पास गए। लेकिन सबने एक ही जवाब दिया, आपका बच्चा नेत्रहीन है। यह कभी नहीं देख पाएगा। उनके माता पिता को इस बात को समझने में काफी वक्त लगा।

श्रीकांत का बचपन आंध्र प्रदेश के सीतारामपुरम गांव में बीता। श्रीकांत के परिवार की कमाई का एकमात्र स्रोत खेती करना था। श्रीकांत को हमेशा प्यार की जगह दया मिली। श्रीकांत जैसे-जैसे बड़े होते गए, परिवार की चिंता बढ़ती गई। उनके परिवार को हमेशा उनके गिरने, चोट लगने का ही डर लगा रहता था। श्रीकांत जब पांच साल के हुए, तो पिताजी उन्हें अपने साथ खेत पर ले जाने लगे। उनके पिता को लगता था कि शायद श्रीकांत कुछ मदद करा देगें। लेकिन 5 साल के बच्चे का खेती करना बहुत मुश्किल था। इसलिए उनके पिता ने उनका एडमिशन गांव के एक स्कूल में करा दिया।

श्रींकांत के घर से उनका स्कूल लगभग 5 किलोमीटर दूर था। उन्हें रोज पैदल जाना पड़ता था। श्रीकांत के नेत्रहीन होने के कारण उन्हें क्लास की सबसे पिछली सीट पर बैठाया जाता। कोई बच्चा उनसे दोस्ती करने को तैयार नहीं था। उन्हें पीटी क्लास में आने से मना कर दिया जाता था। जिसके बाद उनके पिता को नेत्रहीन बच्चों के स्कूल के बारे में पता चला। वह बेटे को लेकर हैदराबाद पहुंचे और वहां उनका दाखिला करा दिया। इस स्कूल का माहौल बिल्कुल अलग था। यहां सारे बच्चे नेत्रहीन थे। जिसकी वजह से श्रीकांत के बहुत से दोस्त बन गए। यहां उन्हें कोई तंग नहीं करता था।

श्रीकांत यहां कुछ ही दिनों में ही लिखना-पढ़ना सीख गए। स्कूल में उन्हें पढ़ाई के साथ क्रिकेट और शतरंज खेलने का भी मौका मिला। हर कक्षा में वह फर्स्ट आने लगे। दसवीं में उन्होंने स्कूल में टॉप किया। जिसके कारण उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के लीड इंडिया प्रोजेक्ट से जुड़ने का मौका मिला। इससे उनके घरवाले बहुत खुश हुए। श्रीकांत को दसवीं की परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त हुए। श्रीकांत साइंस पढ़ना चाहते थे लेकिन नेत्रहीन होने की वजह से उन्हें साइंस नहीं मिली। लेकिन श्रीकांत ने इसे हल्के में नहीं लिया। उन्होंने कानून का सहारा लिया। जिसके बाद उन्हें साइंस पढ़ने की अनुमति मिल गई। उन्होंने संघर्ष के बाद आखिरकार अपने पंसद के विषय को पढ़ा। जिसके बाद 12 वीं कक्षा में श्रीकांत को 98 प्रतिशत अंक प्राप्त हुए।

श्रीकांत आईआईटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना चाहते थे। लेकिन वहां नेत्रहीन लोगों के लिए कोई सीट नहीं थी। उन्होंने बहुत कोशिश की लेकिन उन्हें एडमिशन नहीं मिला। जिसके बाद श्रीकांत ने विदेशी यूनिवर्सिटी में एडमिशन की कोशिश की। चार अमेरिकी यूनिवर्सिटी ने उनके आवेदन स्वीकार कर लिया। उन्होंने बीटेक के लिए मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी को चुना। श्रीकांच एमआईटी में पढ़ने वाले वह पहले अंतरराष्ट्रीय नेत्रहीन छात्र बन गए। पढ़ाई पूरी होने के बाद उनके पास कई कंपनियोंके जॉब के ऑफर आए लेकिन श्रीकांत अपने देश भारत वापस आना चाहते थे। वो वापस आ गए।

श्रीकांत किसी और के लिए काम नहीं करना चाहते थे। वो खुद की कंपनी खोलना चाहते थे। लेकिन उनके परिवार वाले इस फैसले से खुश नहीं थे। सभी यही चाहते थे कि वो अमेरिका में ही नौकरी करें। लेकिन श्रीकांत ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने वापस आकर हैदराबाद में दिव्यांगों के लिए सेंटर खोला। यह संस्थान दिव्यांगों की पढ़ाई में मदद करता है। 2012 में उन्होंने बोलेंट इंडस्ट्री की शुरुआत की। यह ऐसी  कंपनी है जिसका मुख्य लक्ष्य अशिक्षित और दिव्यांग लोगों को रोजगार देना है | श्रीकांत का यह कार्य धीरे-धीरे प्रसिद्ध होने लगा। धीरे-धीरे इस कंपनी का टर्नओवर 50 करोड़ फिर 80 करोड़ के पास पहुंच गया। शुरुआती पांच साल में उनकी कंपनी ने जबर्दस्त तरक्की की। 2017 में फोब्र्स ने उन्हें एशिया के 30 साल से कम उम्र के बिज़नेसमैन की सूची में शामिल किया था।

श्रीकांत के पास आज पांच शहरों में उनकी कंपनी के प्लांट हैं। आज उनके पास कंपनी की चार प्रोडक्ट कंपनियां हैं जिनमें से पहली हुबली कर्नाटक में, दूसरी निजामाबाद तेलंगाना, तीसरी भी तेलंगाना के हैदराबाद में है और चौथी जो कि सो प्रतिशत सौर ऊर्जा द्वारा संचालित होती है वो आंध्र प्रदेश के श्री सिटी में हैं। श्रीकांत आज करोड़ों रुपये कमा रहे हैं। श्रीकांत ने कभी भी अपनी शारीरिक अक्षमता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। श्रीकांत ने अपनी सफलता की कहानी (Success Story) अपने मेहनत और कभी हार ना मानने के जज्बे के साथ लिखी है। श्रीकांत बोला आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत  (Inspiration) बन चुके हैं। जो लोग शारीरिक कमी के कारण हार मान जाते हैं उनके साथ अन्य लोग भी इस 

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